छप्पय छंद- दिसंबर ले जा
ले जा तँय ये साल, दिसंबर हावय विनती ।
कोरोना ले मौत, नही अब एखर गिनती ।।
खतरनाक ये साल, कहर ये हा बरपाइस ।
अनुशासन के रोक, रास नइ एहा आइस ।।
भारत के सब नागरिक, डर के साया मा खड़े ।
कोरोना से भय अबड़, मनुज सोच मा हे पड़े ।।
लइका के ए साल, पढ़ाई नइ हे पूरा ।
शाला जाना बंद, पाठ्यक्रम सबो अधूरा ।।
उन्नति के ये मार्ग, सुनौ कुछु नइ हे अच्छा ।
देखौ लगिस विराम, पढ़े के खोवय इच्छा ।।
ज्ञान ध्यान सब भूलथे, लइका जम्मो आज जी ।
खेलकूद मा व्यस्त हे, भूलिन पढ़ना काज जी ।।
कष्ट भरे ये साल, नही हे रोजी मानौ ।
संकट बहुत विशाल, गरीबी अब्बड़ जानौ ।
तड़पय नित्य किसान, धान के पड़गे लाले ।
बिलखत सब परिवार, विकट दिन आइस काले ।।
जन जन रोवत हे अबड़, बेकारी ले त्रस्त हे ।
नेता मन ला का फिकर, सत्ता मा ओ मस्त हे ।।
दुखी अबड़ मजदूर, परत हे आसूँ पीना ।
आय कहाँ ले होय, परत हे लांघन जीना ।।
हावय राशन कार्ड, अन्न पुरथे नइ इनला ।
बीमारी नइ पीर, भूख ले मारय मनला ।।
दीन दुखी के हाल जी, रोवत सबके नैन जी ।
स्वस्थ देह कइसे मिलय, खोइन दिन के चैन जी ।।