Wednesday, 23 December 2020

छप्पय छंद

छप्पय छंद 

प्रीत बड़ा तड़पाय,हृदय व्याकुल है मेरा।
तकती हूँ मै राह,रात से हुआ सवेंरा।।
इन नैनों को आस,नीर है झर झर बहते।
तुम दोगे आवाज,राह को हरदम तकते।
मेरे मन की यह व्यथा,सुनते सारे लोग है।
दीवानी सी फिर रही,दर्द भरा ये रोग है।।

सखियों का वह शोर,अब न भाये सजना।
भूख प्यास सब त्याग,भूल गई मैं सँवरना।।
मुझको विरह सताय,सोच में निसदिन रहती।
अश्क बने अंगार,सनम आओ ये कहती।।
मेरी है यह दुर्दशा,हर क्षण जपती नाम हूँ।
आकर मुझको थाम लो,देती ये पैगाम हूँ।।

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