चौपाई छंद-आक्सीजन कहाँ है
आक्सीजन अब ढूँढ रहे हो।मत काटों क्या पेड़ कहे हो।
वर्तमान में मानुष रोता।लोभ मोह में सबकुछ खोता।।
कलयुग का यह है संदेशा।कभी लगाया नहिं अंदेशा।
प्रतिक्षण मानुष जूझ रहा है।वृक्ष न काटों कभी कहा है।।
जीवन तो बस वृक्ष जहाँ है।आक्सीजन बस मिले वहाँ है।
आज सबक हमको लेना है।वृक्षों को जीवन देना है।।
फैल गया है ये कोरोना।आज पड़े है जीवन खोना।
तड़प तड़प कर मरते सारे।आज वायरस सबको मारे।।
कैसे मानव जीव बचाए।आक्सीजन कैसे नित लाए।
व्याकुल होकर तड़पे भारी।वर्तमान की ये लाचारी।।
कलयुग में यह संकट आया।कोरोना जन को तड़पाया।
आक्सीजन पैसो में बिकता।बिन इसके कोई न टिकता।।
प्रकृति देख चुपचाप खड़ी है।मनुज काल की विषम घड़ी है।
अब पछताए कुछ नही होता।फल वैसा पाए जो बोता।।
वृक्ष लगाना ध्येय बनाएँ।जन जन को यह बात बताएँ।
शुद्ध वायु है एक अधारा।इसे बचाना लक्ष्य हमारा।।
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