Friday, 17 April 2020

कुकुभ छंद

कुकुभ छंद

भ्रष्ट नेता

नेता अइसे भ्रष्ट हवय गा,अपन जेब ला भरथे जी।
वोट मांग के नेता बनगे,लोभ मोह बड़ रखथे जी।।

जीत जथे ता नेता मन सब,अपने सेवा ला जानै।
लूटत हावै गरीब मन ला,बात कभू गा नइ मानै।।

मरत हवे कतको किसान मन,दुख हावय ओखर भारी।
लागा करजा मा सब बुड़गे,अइसे हावय लाचारी।।

रोजगार सब खोजत हावय,पढ़ लिख के हावय खाली ।
घूस दिये अउ मिलय नौकरी,ओखर डिग्री हे जाली।।

टूटे घर ला फूटे छानी,सबला कोन बनाही जी।
सरकारी पइसा खा जाथे,देखत रहय तबाही जी।।

जे गरीब के खुलथे खाता,जम्मो पइसा ले जाथे।
मर-मर के जीये गरीब हा,नेता अपने गुन गाथे।।

नेता मनके हवे सुवारथ,अब्बड़ पापी बनगे हे।
कोनो के कछु नइ बिगड़े जी,दुखिया सबो तड़पगे हे।।

खाता सबके खुलगे हावय,पइसा एको नइ हावै।
काटत हावय बैंक देख जी,फोकट चारज कट जावै।।

लोन सबो के खा जाथे सब, दे सरकारी हमला जी।
नजर गड़े हे नेता मनके,होवत हे सब घपला जी।।

नेता मनके भ्रष्ट काम हा,बड़े बिमारी बन गे हे।
राज-काज के लालच मा सुन,सबके माथा तन गे हे।।

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