Friday, 17 April 2020
सरसी छंद
*सुनले मोरो गोठ*
पीयत दारू काहे संगी ,सुनले मोरो गोठ।
झन पीबे तयँ दारू संगी,गोठ करो मयँ पोठ।।
कर देथे घर बार नाश जी,हावय ये विषपान।
सुग्घर जीवन जीले मानुष,तन के गुन ला जान।।
दारू हावय जहर बरोबर,नाता सबो छुड़ाय।
घर के विपदा नइ जानय जी,सबला देय भुलाय।।
ठेनी झगरा रोज करय जी,कारन बिन रूलाय।
रद्दा चोरी के धर लेवय ,पइसा लेय लुकाय।।
बिन कारन गारी देवत हे,तयँ अपमान कमाय।
गहना जेवर सब बेचत हे,करके नशा गँवाय।।
रोवत रहिथे घरवाली हा,रोवत लइका जान।
दारू के आदत खराब हे,खो देवय पहिचान।।
संगी मनला अइसन रखबे,रद्दा नेक दिखाय।
सुग्घर जिनगी तयँ जीबे ता,जनम सफल हो जाय।।
नशा नाश के जड़ कहिथे जी,पढ़लव सब ए ज्ञान।
जम्मो रिश्ता खो डरबे तयँ,खो देबे पहिचान।।
रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता -एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग.)
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