छंद: लवंगलता सवैया
अनाथ हवे दुख पीर सबो नित मात पिता ल पुकारत हावय।
सतावत हे दिन रात इही उन काबर छोड़ भुलावत जावय।
बिना ममता दिन रात न बीतय ये तरसैं नित रोवय गावय।
सियान हवे नइ तीर म जी भगवान घलो बड़ देख सतावय।।
न्याय कहाँ मिलथे ग कभो हम दीन दुखी मन रोवत हावन।
गरीब सहे कतका दुख झेलय काखर तीर म पीर बतावन।
सबो ठग के नित लूटत हे ग अनाज नही अब जेन ल खावन।
सरकार घलो चुप देखत हे कछु काज करे सुख ला तब पावन।।
Saturday, 18 April 2020
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