मनहरण घनाक्षरी छंद
दारू झन पी
दारू काहे पिये संगी,घर मा जी रहे तंगी,
परिवार वाला मन,बड़ खिसियात हे।
बिख हावै तैहा जान,पियौं नइ मन ठान ,
लीवर सड़ात बड़,बिमारी बढ़ात हे।
नशा सब छोड़ दे जी,मुँहु तँय मोड़ दे जी
अभी माते मनखे हा,पाछु पछतात हे।
घर दुरा लुट जाही, मिले नइ तोला काही,
समै बलवान हावै,तोला ये सिखात हे।
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