Tuesday, 30 July 2019

बरवै छंद

बरवै छंद-श्रीमति आशा आजाद

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस

सुग्घर भाखा हावय,अपने जान।
       छत्तीसगढ़ी भाखा,हवे महान।।1

गुरतुर मीठा सुनले,एखर बोल।
        मनखे जम्मो रस ला,देवय घोल।।2

तोला मोला कहिथे,सुग्घर भाय।
       अपन राज के भाखा,गजब सुहाय।।3

छत्तीसगढ़ी भाखा,नेक विचार।
        सब मनखे के जानौ,ये आधार।।4

अलग जिला के अलगे,बोली जान।
        जम्मो मनखे करथे,जी सम्मान।।5

कोनो आहूँ-जाहूँ,बोलय नेक।
        आबो-जाबो बोली,सब हा ऐक।।6

अंतर उच्चारन मा,कतका होय।
        छत्तीसगढ़ी सबला,हे संजोय।।7

राज अपन ला बन्दौं,बारंबार।
       सुग्घर भाखा बोलव,दव सत्कार।।8

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़





बरवै छंद

बरवै छंद

सुग्घर जीले जिनगी,हेअनमोल।
      गोठ बात ला करबे,सुग्घर तोल।।1

अइसन गुरतुर भाखा,ला तँय बोल।
     मया पिरित के रस ला,मीठा घोल।।2

भेद भाव ला करदे,तँय हा त्याग।
     छोड़ कपट ला अंतस,मन ले जाग।।3

जगा जगा मा सुनले,बाढ़ँय नाम।
      कभू न बिगड़े करबे,अइसन काम।।4

दीन दुखी ला देबे,सुग्घर हाथ।
    बिगड़ी बन जावय गा,देबे साथ।।5

पाप पुन्य के रद्दा,अइसन होय।
      कभो न तोर करम ले,कोनो रोय।।6

छप्पय छंद

छप्पय छंद..

(1)*प्राथमिक ज्ञान*
पढ़ले पहिली पाठ,पहल कर स्कूल जाके।
  बनही जी आधार,पढ़ँव सब सुग्घर गा के।।
    खेलव कूदँव रोज,संग मा भोजन खावौ।
       मध्यांतर मा खेल,मजा कर सब घर जावौ।।
         कहँय प्राथमिक ज्ञान हा,देवय सुघ्घर सार जी।
            मिलय इही ले मान हा,बनथे जान आधार जी।।

(2)*जा बेटी ससुरार*
जा बेटी ससुरार,मया तँय राखे रहिबे।
   हवँय उही घर बार,सास ला दाई कहिबे।।
     देबे सबला मान,ससुर के सेवा करबे।
       सबो नता ला जान,मान गुन तँय हा धरबे।।
         सुमता रखबे जान ले,जम्मो दुख सुख साँठ ले।
           झन छूटय सुन थाम ले,मया दया के गाँठ ले।।

(3)*नेक रद्दा चुनले*
करम अपन हे हाथ,नेक तँय रद्दा चुनले।
  फल के आशा छोड़,धीर ला तयँ हा गुनले।।
    मिहनत मा दे ध्यान,डहर हा तोला मिलही।
       ठलहा झन तयँ बइठ,करम हा सबला दिखही।
         पूजा काम ला मान ले,मिहनत देही साथ गा।
           जिनगी इही हे जान ले,हाथ हा जगन्नाथ गा।।

(4)*झन फेंकँव भात*
काहे फेंकय भात,जगत मा पूजे जाथे।
  जीवन चलथे जान,भूख ला इही मिटाथे।।
    जांगर टोर कमाय ,अन्न के कौरा बर जी।
       अन्न दान ला करव,फेंक झन समझौ सब जी।।
         अन्न कुंवारी मान हे,जीवन इही चलाय गा।
           भोजन बिन तन नाश हे,अब्बड़ सुख पहुँचाय गा।

(5)*होली आगे*
होली आगे देख,सबो संगी जुरियावय।
   छेड़ नगाड़ा थाप,थिरक के गाना गावय।।
     अपने धुन के साज,तान ला छेड़व संगी।
       दिखत हवँय जी आज,बने हे रंग बिरंगी।।
         बने मजा के खेल ले,ठेनी जगरा छोड़ दे।
           मया पिरित के रंग ले,सब नाता ला जोड़ दे।।

(6)*मानुष तन ला जान*
मानुष तन ला जान,काल कब कहाँ ले जावय।
  अइसन कर तयँ काम,जगत हा गुन ला गावय।
    मानवता ला जान,करम तय सुग्घर करबे।
     मानुष ला पहिचान,गलत झन रद्दा चलबे।
       मरना सत हे मान ले,मानुष के नइ जोर गा।
         जियते करम सुधार ले,मरबे ता हो सोर गा।।

(7)फागुन महिना
फागुन महिना आय,रंग सबझन जी खेलव।
   भरे थाल मा रंग,मया सबझन ला देदव।।
     गीत मया के गाव,नगाड़ा धुन मा नाचव।
       सुमता रखहू जान,बैर कोनो झन राखव।।
         होली सुग्घर मानलव,हँसी खुशी के साथ जी।
           सुमता के रंग डाल लव,मिला सबो ले हाथ जी।।

(8)जी हत्या

जी हत्या हे पाप,सुवारथ मन ला डारय।
   बकरा बलि चढ़ाय,दोष बिन काहे मारय।।
     अपन करम ला त्याग,गलत रद्दा ला चुनही।
       ले डारिन ए जीव,करम नइ अपने गुनही।।
         बलि कारज ला छोड़ दे,जीव बचा झन मार गा।
             कंबल दू ठन दान दे,पाप होय बलि टार गा।।

कुण्डलिया छंद

कुण्डलिया छंद-श्रीमति आशा आजाद

(1)तार दे
मोला विद्या ज्ञान दे,माँगत हँव करजोर।
  सत के रद्दा तँय बता,विनती हावय मोर।।
    विनती हावय मोर,चलव मँय सत के रद्दा।
      पइयाँ लागौ तोर,दूर हो जावय विपदा।।
        तयँ हस तारन हार,सबोझन सुमिरय तोला।
          बाँटत हाँवस ज्ञान,तार दे दाई मोला।।

(2)सुग्घर जिनगी
जिनगी के दिन चार हे,हाँसत खेल गुजार।
   ठेनी झगरा छोड़ दे,जिनगी अपन सुधार।।
      जिनगी अपन सुधार,नेक तँय मारग चुनले।
         भेदभाव ला छोड़,मया ला हिरदे रखले।।
            दुख-सुख संगे बाँट,रहय झन बैरी संगी।
               मिलके रहिबो साथ,होय जी सुग्घर जिनगी।।

(3)नारी अवतार
मँय नारी अवतार हो,जग मा हे पहिचान।
  सरी जगत मा मान हे,देत हवय सम्मान।।
    देत हवय सम्मान,कहय जम्मो महतारी।
      बेटी दाई जान,इही ले हवय चिन्हारी।।
       सुख-दुख रहिथों थाम,करौ मँय सेवा भारी।
         धरथों नावा जीव,दरद सहिंथों मँय नारी।।

(4)झन काँटव
झन काँटव जी रूख रई,एहा हावय शान।
    जीवन हमला देत हे,इही बचावय प्रान।।
       इही बचावय प्रान,एकठन पेड़ लगावव।
          जीवन एमा जान,काट झन मान घटावव।।
             पउधा रोज लगाव,जरी मा पानी डालौ।
                देही बढ़िया छाँव,जान के रूख झन काटव।।

(5)*लालच*
झूठ लबारी गोठ ला ,मनखे मन गठियाय।
   लालच पइसा के करें,सत् ला नइ ता भाय।।
     सत ला नइ ता भाय,असत् के रद्दा धरथें।
        हावय लोभ अपार,रात दिन एके करथें।।
          जाना खाली हाथ,जगत ले आही पारी।
             अब ता मनखे चेत ,छोड़ दे झूठ लबारी।।

(6)साँई बाबा
साँई बाबा कर दया,करत हँवव गोहार।
   विपदा हावय तार दे,कर मोरो उद्धार।।
     कर मोरो उद्धार,कतक ये पीरा हावय।
       रोवत हव दिन रात,सबो दुख हा मिट जावय।
         तही हवस सुन मोर,धाम अउ मस्जिद काबा।
          अंतस मोर समाय,तही हस साँई बाबा।।

(7)गुरु
बाँटत हावय देख लव, छत्तीसगढ़ी ज्ञान।
  अरुन निगम हे गुरु हमर,सीखवँ छंद विधान।।
      सीखव छंद विधान,ध्यान ला थोरिक धरलव।
        छंद साधना जान,सबो झन मिहनत करलव।।
          जम्मो साज सिखायँ,इही नव पाठ चलावयँ।
             गुनले गुरु के ज्ञान,आज जे बाँटत हावयँ।।

(8)छंद ज्ञान
जुरमिल पढ़थे पाठ ला,नित दिन देवय ध्यान।
   निगम गुरु के चरन मा,साधक के परनाम।।
      साधक के परनाम,हमन सब ध्यान ल धरबो।
         जुरमिल एके साथ,सबो झन मिहनत करबो।।
            होही जी उद्धार,छंद ला जम्मो गढ़थे।
              छंद साधना कहाय,इहा सब जुरमिल पढ़थे।।

(9)सीखबो छत्तीसगढ़ी
छत्तीसगढ़ी छंद के,बाँटत हे जी ज्ञान।
   अरुन निगम हे गुरु हमर,सीखवँ छंद विधान।।
      सीखवँ छंद विधान,ध्यान ला थोरिक धरलव।
         छंद साधना जान,सबो झन मिहनत करलव।।
           जम्मो साज सिखायँ,चलव जुर मिलके बढ़ी।
             ऐमा धियान लगाव ,सीखबो छत्तीसगढ़ी।।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग.)

बरवै छंद

बरवै छंद

सुग्घर जीले जिनगी,हेअनमोल।
      गोठ बात ला करबे,सुग्घर तोल।।1

अइसन गुरतुर भाखा,ला तँय बोल।
     मया पिरित के रस ला,मीठा घोल।।2

भेद भाव ला करदे,तँय हा त्याग।
     छोड़ कपट ला अंतस,मन ले जाग।।3

जगा जगा मा सुनले,बाढ़ँय नाम।
      कभू न बिगड़े करबे,अइसन काम।।4

दीन दुखी ला देबे,सुग्घर हाथ।
    बिगड़ी बन जावय गा,देबे साथ।।5

पाप पुन्य के रद्दा,अइसन होय।
      कभो न तोर करम ले,कोनो रोय।।6

बरवै छंद

बरवै छंद-श्रीमती आशा आजाद

पानी के कीमत ला जान

पानी के कीमत ला,मनखे जान।
     फोकट झन फेकौं जी,हवे परान।।1

बूँद बूँद ला राखव,जतनव रोज।
     कीमत नइ जानहूँ,करहूँ खोज।।2

बुरा समय ला जानौ,करलौ काम।
     प्यासा पीये मनखे,लेवय नाम।।3

जग के हित मा पानी,सबो बचावँ।
      गुनलव पानी ला झन,जान गवावँ।।4

कतका पीरा होवय,तँय ये मान।
      रोवत बिलखत हे सुन,खोय परान।।5

गंदा पानी पीये ,कतका रोय।
       कतक बिमारी मा सुन,तन ला खोय।।6

चेत धरौ सब मानौ,मोरे गोठ।
       जिनगी बचही कहिथौ,मँय हा पोठ।।7

रचनाकार-श्रीमति आशा आजाद
पता -मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

बरवै छंद

बरवै छंद-श्रीमति आशा आजाद

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस

सुग्घर भाखा हावय,अपने जान।
       छत्तीसगढ़ी भाखा,हवे महान।।1

गुरतुर मीठा सुनले,एखर बोल।
        मनखे जम्मो रस ला,देवय घोल।।2

तोला मोला कहिथे,सुग्घर भाय।
       अपन राज के भाखा,गजब सुहाय।।3

छत्तीसगढ़ी भाखा,नेक विचार।
        सब मनखे के जानौ,ये आधार।।4

अलग जिला के अलगे,बोली जान।
        जम्मो मनखे करथे,जी सम्मान।।5

कोनो आहूँ-जाहूँ,बोलय नेक।
        आबो-जाबो बोली,सब हा ऐक।।6

अंतर उच्चारन मा,कतका होय।
        छत्तीसगढ़ी सबला,हे संजोय।।7

राज अपन ला बन्दौं,बारंबार।
       सुग्घर भाखा बोलव,दव सत्कार।।8

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़





बरवै छंद

बरवै छंद- श्रीमती आशा आजाद

दिव्यांग दिवस

तन ले होय भले जी,जे दिव्यांग।
   नइ जाने जी एमन,करना स्वांग।।1

सबो काम ला जानय ,येमन आज।
   मिहनत ले करथे ओ,निसदिन काज।।2

हिरदे मा राखत हे ,मीठा भाव।
    जीत लेय जी अइसन,जेन स्वभाव।।3

खुदे कमावय पोषय,कतका पेट।
    कतको दुख पीरा ला,रखय समेट।।4

मन के होवय सुग्घर,सबला जान।
    भूले झन करिहौ जी,सुन अपमान।।5

मनखे बढ़ियाँ रहिथे,सुग्घर गोठ।
    असत भावना नइ हे,कहिंथो पोठ।।6

सुग्घर गुत्तुर बानी,मीठा बोल।
    मानवता के रस ला,राखव घोल।।7

आघू बढ़ जावौ सब,हिम्मत लाव।
    मुश्किल ला देखत ही,दूर भगाव।।8

कर्मठता ले सबझन,आघू आव।
    अपने करम ले सुघ्घर,नाम कमाव।।9

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर कोरबा छत्तीसगढ़

बरवै छंद

बरवै छंद

बेटी बचावव

जन जन ला ये देदव,नेक विचार।
    नोनी-बाबू एके,सम आधार।।1

लोभ मोह मा फँसके,करथे नाश।
     भ्रूण नाश ले टूटे,हे विश्वास।।2

बसे मइल ला मन के,सबझन धोय।
     पाछु पछताय करनी,करके रोय।।3

भेद मिटावय समता,एक बनाय।
     घर-घर बेटी जन्मे ,खुशी मनाय।।4

बोझ समझ के करथे,कतका पाप।
     इही जनम देवइया,नोहय श्राप।।5

धरती मा जन्मे हे,माँ अवतार।
     इही ले हावय सुग्घर, घर संसार।।6


बरवै छंद

बरवै छंद

गुरु के महिमा हावय,अपरंपार।
      गुरु देत हे हमला,सब आधार।।1

पसबके करथे सुनले,बेड़ा पार।
     नेक करम ला देवै,सुग्घर सार।।2

पबरित मन ला रखथें,गुण अनमोल।
     सरी जगत मा नइ हे, एखर मोल।।3

जगगम बरथे किस्मत,अपने जान।
      प्रेम भाव हा गुरु के,अबड़ महान।।4

नवा राह के देवय,नित संदेश।
      द्वेष भाव अउ मिटथे,छिन मा क्लेश।।5

सरी जगत के हावय,ये सरताज।
      नेक करम ला बाँटय,सुग्घर साज।।6

सउँवत हावय गुनलौ,ये भगवान।
       देखावय नित रद्दा,दय पहिचान।7

बरवै छंद-छंद परिवार

बरवै छंद...

छंद परिवार

छंद साधना करथे ,नितदिन जान।
    ज्ञान देत हे धरलौ,सबझन ध्यान।।1

गुरु ला सबझन सुमिरौ,धरलव पाँव।
      छंद साधना गुरु के,हावय छाँव।।2

भाई बहिनी रहिथे,संगे जान।
     भाईचारा सुग्घर, हे सम्मान।।3

सुग्घर कक्षा होवय ,रोजे देख।
     जगा जगा मा बाढ़य,पढ़लव लेख।।4

दया मया हा बहिथे,इहाँ अपार।
       छंद साधना सुग्घर, नव आधार।।5

गुरु के महिमा मुख ले,नइ ता होय।
       छंद सार मा डूबे,रहिथे खोय।।6

सुग्घर दीदी भैया,देवय सार।
       ज्ञान ध्यान अउ सुग्घर,दय व्यवहार।।7

गुरु के सुग्घर भाखा,गुरतुर बोल।
        छंद साज रस देवय,नितदिन घोल।।8

सुग्घर सबझन साधव,छंद विधान।
        नित साधे ले बड़ही,अपने ज्ञान।।9







Monday, 22 July 2019

छत्तीसगढ़ी लोकगीत

छत्तीसगढ़ी लोकगीत

छत्तीसगढ़ के गुत्तुर भाखा,
     अड़बड़ मीठ मीठ आय।
          जभे मिले संग संगवारी मन,
              अड़बड़ मजा जी आय।

(1)छत्तीसगढ़ के चीला रोटी,
         अड़बड़ संगी मिठाय।
             संगे खावौ पताल चटनी,
                 मन हा अड़बड़ ललचाय।
                      छत्तीसगढ़ के गुत्तुर.....

(2)रतिहा के बाँचे भात संगी,
         कभो नइ त फेंके जाय।
             रतिहा ओला पानी मा बोरौ,
                   बिहनिया बासी बन जाय।
                        छत्तीसगढ़ के गुत्तुर....

(3)बासी मा खावौ मिरचा चटनी,
        गोंदली संग म कतक मिठाय।
              बासी मा भरे पानी ला संगी,
                  सुरूँट सुरूँट पिये  जाय।
                        छत्तीसगढ़ के गुत्तुर....

(4)छत्तीसगढ़ के सेकवा रोटी,
         रोठ मोट बनाये जाय।
               दुए ठन रोटी मा हमर पेट हा,
                    खम खम ले भर जायं।
                         छत्तीसगढ़ के गुत्तुर...

(5)छत्तीसगढ़ के सोहारी रोटी,
        नावाँ चउँर मा मिठाय।
             ताते ताते ओला खाके संगी,
                 सबो रोटी के सुरता भुलाय।
                      छत्तीसगढ़ के गुत्तुर...

(6)छत्तीसगढ़ के ठेठरी खुरमी,
        चाबे मा नई त चबाय।
             ऐला खाय ले हमर मुहुँ ले,
                 कुरूँम कुरूँम बाजे जाय।
                      छत्तीसगढ़ के गुत्तुर..

(7)छत्तीसगढ़ के गुरतुर भाखा,
        अड़बड़ मीठ मीठ आय।
             सबो मया ले गोठियाए रे संगी,
                  मन हा गदगद हो जाय।
                        छत्तीसगढ़ के गुत्तुर....

लोकगीत रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-मानिकपुर,मानिकपुर,छत्तीसगढ़