छप्पय छंद..
(1)*प्राथमिक ज्ञान*
पढ़ले पहिली पाठ,पहल कर स्कूल जाके।
बनही जी आधार,पढ़ँव सब सुग्घर गा के।।
खेलव कूदँव रोज,संग मा भोजन खावौ।
मध्यांतर मा खेल,मजा कर सब घर जावौ।।
कहँय प्राथमिक ज्ञान हा,देवय सुघ्घर सार जी।
मिलय इही ले मान हा,बनथे जान आधार जी।।
(2)*जा बेटी ससुरार*
जा बेटी ससुरार,मया तँय राखे रहिबे।
हवँय उही घर बार,सास ला दाई कहिबे।।
देबे सबला मान,ससुर के सेवा करबे।
सबो नता ला जान,मान गुन तँय हा धरबे।।
सुमता रखबे जान ले,जम्मो दुख सुख साँठ ले।
झन छूटय सुन थाम ले,मया दया के गाँठ ले।।
(3)*नेक रद्दा चुनले*
करम अपन हे हाथ,नेक तँय रद्दा चुनले।
फल के आशा छोड़,धीर ला तयँ हा गुनले।।
मिहनत मा दे ध्यान,डहर हा तोला मिलही।
ठलहा झन तयँ बइठ,करम हा सबला दिखही।
पूजा काम ला मान ले,मिहनत देही साथ गा।
जिनगी इही हे जान ले,हाथ हा जगन्नाथ गा।।
(4)*झन फेंकँव भात*
काहे फेंकय भात,जगत मा पूजे जाथे।
जीवन चलथे जान,भूख ला इही मिटाथे।।
जांगर टोर कमाय ,अन्न के कौरा बर जी।
अन्न दान ला करव,फेंक झन समझौ सब जी।।
अन्न कुंवारी मान हे,जीवन इही चलाय गा।
भोजन बिन तन नाश हे,अब्बड़ सुख पहुँचाय गा।
(5)*होली आगे*
होली आगे देख,सबो संगी जुरियावय।
छेड़ नगाड़ा थाप,थिरक के गाना गावय।।
अपने धुन के साज,तान ला छेड़व संगी।
दिखत हवँय जी आज,बने हे रंग बिरंगी।।
बने मजा के खेल ले,ठेनी जगरा छोड़ दे।
मया पिरित के रंग ले,सब नाता ला जोड़ दे।।
(6)*मानुष तन ला जान*
मानुष तन ला जान,काल कब कहाँ ले जावय।
अइसन कर तयँ काम,जगत हा गुन ला गावय।
मानवता ला जान,करम तय सुग्घर करबे।
मानुष ला पहिचान,गलत झन रद्दा चलबे।
मरना सत हे मान ले,मानुष के नइ जोर गा।
जियते करम सुधार ले,मरबे ता हो सोर गा।।
(7)फागुन महिना
फागुन महिना आय,रंग सबझन जी खेलव।
भरे थाल मा रंग,मया सबझन ला देदव।।
गीत मया के गाव,नगाड़ा धुन मा नाचव।
सुमता रखहू जान,बैर कोनो झन राखव।।
होली सुग्घर मानलव,हँसी खुशी के साथ जी।
सुमता के रंग डाल लव,मिला सबो ले हाथ जी।।
(8)जी हत्या
जी हत्या हे पाप,सुवारथ मन ला डारय।
बकरा बलि चढ़ाय,दोष बिन काहे मारय।।
अपन करम ला त्याग,गलत रद्दा ला चुनही।
ले डारिन ए जीव,करम नइ अपने गुनही।।
बलि कारज ला छोड़ दे,जीव बचा झन मार गा।
कंबल दू ठन दान दे,पाप होय बलि टार गा।।
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