बरवै छंद
गुरु के महिमा हावय,अपरंपार।
गुरु देत हे हमला,सब आधार।।1
पसबके करथे सुनले,बेड़ा पार।
नेक करम ला देवै,सुग्घर सार।।2
पबरित मन ला रखथें,गुण अनमोल।
सरी जगत मा नइ हे, एखर मोल।।3
जगगम बरथे किस्मत,अपने जान।
प्रेम भाव हा गुरु के,अबड़ महान।।4
नवा राह के देवय,नित संदेश।
द्वेष भाव अउ मिटथे,छिन मा क्लेश।।5
सरी जगत के हावय,ये सरताज।
नेक करम ला बाँटय,सुग्घर साज।।6
सउँवत हावय गुनलौ,ये भगवान।
देखावय नित रद्दा,दय पहिचान।7
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