Tuesday, 30 July 2019

कुण्डलिया छंद

कुण्डलिया छंद-श्रीमति आशा आजाद

(1)तार दे
मोला विद्या ज्ञान दे,माँगत हँव करजोर।
  सत के रद्दा तँय बता,विनती हावय मोर।।
    विनती हावय मोर,चलव मँय सत के रद्दा।
      पइयाँ लागौ तोर,दूर हो जावय विपदा।।
        तयँ हस तारन हार,सबोझन सुमिरय तोला।
          बाँटत हाँवस ज्ञान,तार दे दाई मोला।।

(2)सुग्घर जिनगी
जिनगी के दिन चार हे,हाँसत खेल गुजार।
   ठेनी झगरा छोड़ दे,जिनगी अपन सुधार।।
      जिनगी अपन सुधार,नेक तँय मारग चुनले।
         भेदभाव ला छोड़,मया ला हिरदे रखले।।
            दुख-सुख संगे बाँट,रहय झन बैरी संगी।
               मिलके रहिबो साथ,होय जी सुग्घर जिनगी।।

(3)नारी अवतार
मँय नारी अवतार हो,जग मा हे पहिचान।
  सरी जगत मा मान हे,देत हवय सम्मान।।
    देत हवय सम्मान,कहय जम्मो महतारी।
      बेटी दाई जान,इही ले हवय चिन्हारी।।
       सुख-दुख रहिथों थाम,करौ मँय सेवा भारी।
         धरथों नावा जीव,दरद सहिंथों मँय नारी।।

(4)झन काँटव
झन काँटव जी रूख रई,एहा हावय शान।
    जीवन हमला देत हे,इही बचावय प्रान।।
       इही बचावय प्रान,एकठन पेड़ लगावव।
          जीवन एमा जान,काट झन मान घटावव।।
             पउधा रोज लगाव,जरी मा पानी डालौ।
                देही बढ़िया छाँव,जान के रूख झन काटव।।

(5)*लालच*
झूठ लबारी गोठ ला ,मनखे मन गठियाय।
   लालच पइसा के करें,सत् ला नइ ता भाय।।
     सत ला नइ ता भाय,असत् के रद्दा धरथें।
        हावय लोभ अपार,रात दिन एके करथें।।
          जाना खाली हाथ,जगत ले आही पारी।
             अब ता मनखे चेत ,छोड़ दे झूठ लबारी।।

(6)साँई बाबा
साँई बाबा कर दया,करत हँवव गोहार।
   विपदा हावय तार दे,कर मोरो उद्धार।।
     कर मोरो उद्धार,कतक ये पीरा हावय।
       रोवत हव दिन रात,सबो दुख हा मिट जावय।
         तही हवस सुन मोर,धाम अउ मस्जिद काबा।
          अंतस मोर समाय,तही हस साँई बाबा।।

(7)गुरु
बाँटत हावय देख लव, छत्तीसगढ़ी ज्ञान।
  अरुन निगम हे गुरु हमर,सीखवँ छंद विधान।।
      सीखव छंद विधान,ध्यान ला थोरिक धरलव।
        छंद साधना जान,सबो झन मिहनत करलव।।
          जम्मो साज सिखायँ,इही नव पाठ चलावयँ।
             गुनले गुरु के ज्ञान,आज जे बाँटत हावयँ।।

(8)छंद ज्ञान
जुरमिल पढ़थे पाठ ला,नित दिन देवय ध्यान।
   निगम गुरु के चरन मा,साधक के परनाम।।
      साधक के परनाम,हमन सब ध्यान ल धरबो।
         जुरमिल एके साथ,सबो झन मिहनत करबो।।
            होही जी उद्धार,छंद ला जम्मो गढ़थे।
              छंद साधना कहाय,इहा सब जुरमिल पढ़थे।।

(9)सीखबो छत्तीसगढ़ी
छत्तीसगढ़ी छंद के,बाँटत हे जी ज्ञान।
   अरुन निगम हे गुरु हमर,सीखवँ छंद विधान।।
      सीखवँ छंद विधान,ध्यान ला थोरिक धरलव।
         छंद साधना जान,सबो झन मिहनत करलव।।
           जम्मो साज सिखायँ,चलव जुर मिलके बढ़ी।
             ऐमा धियान लगाव ,सीखबो छत्तीसगढ़ी।।

रचनाकार-श्रीमती आशा आजाद
पता-एसइसीएल मानिकपुर कोरबा (छ.ग.)

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