सुग्घर जिनगी जीले मानुष,दारू तँय हा झन पीबे।
सब संगी मन छोड़ जही ता,रोवत तँँय हा तब जीबे।।
चोरी के रद्दा धर लेबे,पइसा चोरी करबे जी।
धर लेही जब पुलिस हा तोला,जेल सजा मा मरबे जी।।
घर के विपदा नइ जानस तँय,पीयत खुदे भुलाये गा।
रोवत हावय घरवाली हा,ओला अबड़ सताये गा।।
बिन सोचें तँय मारत हावस,अब्बड़ नशा चढ़ाये गा।
भुगतत हे परिवार तोर सुन,भूखा रखे सताये गा।।
चिरहा लुगरा पहिनत हावय,तँय नइ जाने घरवाली।
भूखा रहिके बिलखत लइका,पेट रहय ओखर खाली।।
देख बिमारी मा तड़पत हे,तँय ता होश गवाये गा।
छोड़ जही तोला एक दिन सब,कोन बात समझाये गा।।
दारू गाँजा छोड़ सबो ला,सुग्घर जिनगी तँय जीले।
सबला दे तँय मया दया ला,गुरतुर भाखा रस पीले।।
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