Saturday, 4 August 2018

कति के नौकरी मिलही गा बाबू

कति के नौकरी मिलही गा बाबू,
कति के नौकरी के आस लगाहूँ;
कतका पढ़ लिख डारे हो मँय हा,
कति के नौकरी ला मँय हा पाहूँ।
कति ले मिलही नौकरी गा बाबू...

किंदरत हावौ मँय डिग्री ला धरके,
घूँस बर पइसा कति  बर ले लाहूँ;
का सोच के पढ़े रहे मँय हा बाबू,
दुख सबो ला तुमनके मँय मिटाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

नइ हावै कोनो डहर नौकरी खोजे,
कति ले तुमन के करजा ला छुटाहूँ;
नइ हेे कोनो नेता के साथ गा बाबू,
साथे मा जेखर मँय हा पहुँच लगाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

काबर पढ़े मँय तँय हा काबर पढ़ाये,
गवाँये पइसा ला तोर कइसे छुटाहूँ;
जम्मो डहर पढ़े लिखे के रोना हावै,
कोनो डहर होय आसरा नौकरी पाहूँ।
कति के  नौकरी मिलही गा बाबू...

ठग ठग के जम्मो के पइसा ला खाथे,
अउ दे पइसा मयं सबो झन ला खवाहूँ;
गरीबहा घर के मयं लइका आवं साहब,
अतके पइसा   मय   कति बर ले लाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

दू रोटी के पुरति हावै जे घर मा पइसा,
ऐला गवाँके मँय बता गा काला खाहूँ;
झन संसो करबे बाबू पढ़ लिख के मँय,
का हो जाहि जेन मँय हल ला चलाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू....


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