मानवता ला हिरदय रखलव,समता के सब पढ़लव पाठ।
भाईचारा हिरदय राखौ,बात बाँँधलव सबझन गाठ।।
ठेनी झगरा छोड़ सबो ला,जुरमिल संगे बढ़ते जाव।
भारत के वासी आवन गा,जनगन वंदे सबझन गाव।।
दीन दुखी के सेवा करलव,मनखे मनखे ला पहिचान।
जेखर घर मा भोजन नइ हे,अन्न दान ले बढ़ही मान।।
नारी के रक्षा ला जानौ,सदा दिलावौ सब सम्मान।
रोवय झन नारी गा सुनले,सहय कभो झन ओ अपमान।।
मात-पिता ला सुग्घर पोसय,अइसन बाँटव सबझन ज्ञान।
वृद्धाश्रम मा झन राखय गा,सदा बढ़े सुन घर मा मान।।
भेदभाव के बंधन तोड़ौ,भाई बहिनी सबला बोल।
गलत भाव झन मन मा राखौ,समता के रस मन मा घोल।।
गुरु के सुग्घर मान करौ गा,हवे ज्ञान के ओ भंडार।
आघू-आघू बढ़ जाहूँ सुन,सुग्घर बनही जी संसार।।
कोर कपट ला छोड़ चलौ गा,जलन भाव ला करदे त्याग।
मिहनत करके आघू बढ़जा,अब ता मनखे तँय हा जाग।।
सुग्घर हावय जिनगी तोरे,सत् के रद्दा सबझन जाव।
भारत मा सम्मान करय जी,सुग्घर अइसन मान बनाव।।
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