सरग बरोबर लगथे सबला,महतारी के कोरा हा।
करे जतन दाई हा सबके,सुग्घर रहिथे तोरा हा।।
दाई जेला कहिथे सबझन,ओला दुख पहुँचाथे गा।
नौ महिना के पीरा सहिथे,बड़ ओला रोवाथे गा।।
जम्मो विपदा अपने जानय,दुख ला सबके लेथे जी।
अपने भूखा रहिके दाई ,अपने हिस्सा देथे जी।।
जनम देय नव जीवन तबले,दाई ला दुख देही गा।
आय सियनहा के बेरा तव,दुख ओखर नइ लेही गा।।
छोड़ जथे कोनो बेटा मन,काखर दुख गोहराये गा।
जतन सकल मा कतको राखय,बेटा गुन नइ गाये गा।।
सुनौ अगोरत रहिथे ओहा,बाढ़े मा नइ आये गा।
महल अटारी अब्बड़ भावय,कुरिया नइ ता सुहाये गा।।
ठाठ बाट मा नाता छोड़िस,वृद्धा आश्रम मा छोड़े।
रोवत रहिथे उहा अकेला,चल दे नाता ला तोड़े।।
कोनो बन जाथे कपूत गा,बोझ बरोबर माने हे।
आश्रम मा बिलखत हे दाई,दुख नइ कोनो जाने हे।।
सुग्घर देवय दाई जीवन,जनम मरन सबला जानौ।
इही जनम ला सुग्घर जीलौ,करम सही जम्मो मानौ।।
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