Monday, 6 August 2018

आशा के कविता...छत्तीसगढ़ के गुरतुर भाखा

छत्तीसगढ़ के गुरतुर भाखा,
   अड़बड़ मीठ मीठ आय।
      जभे मिले संग संगवारी मन,
         अड़बड़ मजा जी आय।

छत्तीसगढ़ के चीला रोटी,
  अड़बड़ संगी मिठाय।
      संगे खावौ पताल चटनी,
          मन हा अड़बड़ ललचाय।

रतिहा के बाँचे भात संगी,
   कभो नइ ता फेंके जाय।
       रतिहा ओला पानी मा बोरौ,
          बिहनिहा बासी बन जाय।

बासी मा खावौ मिरचा चटनी,
   गोंदली सँग बासी मिठाय।
       बासी मा भरे पानी ला संगी,
          सुरूट सुरूट पिये  जाय।

छत्तीसगढ़ के सेकवा रोटी,
   रोठ मोट बनाए जाय।
       दुए ठन रोटी मा हमर पेट हा,
           खम खम ले भर जाय।

छत्तीसगढ़ के सोहारी रोटी,
    नावा चउँर मा मिठाय।
        ताते ताते ओला खाके संगी,
            सबो रोटी के सुरता भुलाय।

छत्तीसगढ़ के ठेठरी खुरमी,
    चाबे मा नई त चबाय।
         ऐला खाय ले हमर मुहुँ ले,
              कुरूम कुरूम बाजे जाय।

छत्तीसगढ़ के गुरतुर भाखा,
    अड़बड़ मीठ मीठ आय।
        सबो मया ले गोठियाए रे संगी,
            मन हा गदगद हो जाय।

     

Sunday, 5 August 2018

शक्ति छंद ......छोड़ नशा

नशा गा सुनौ सब ,बड़ा नाश हे।
दरूहा  बने  हे, बने  लाश  हे।।
सबो भूल जावय,नशा डार के।
पिये मा  भुलाये,बिना  सार के।।

गिरे  राह  मा जी,नही  चेत हे।
मरे बर  सुनौ  गा,नशा लेत हे।।
मया छोड़ देवय, नशा मा पड़े।
घरो घर सबो झन,नशा बर लड़े।।

नही सोच पावय,कतक नाश गा।
सबो जान  उजरे,मिटे  आस गा।।
नरक  हो जथे  गा,नही  थाह  हे।
नशा  छोड़  देबे , इही  राह  हे।।

शक्ति छंद...वीर सैनिक

लड़े  देश  बर  गा,सबो जान दे।
    अपन देख सैनिक,कतक मान दे।।
         करत  देख  रक्षा,हमर  शान  ले।
              धरें  हे  तमंचा,चले  तान  ले।।

करत देख सेवा,अबड़ मान ले।
    करे  हे  सुरक्षा,मरे  शान  ले।।
        बसे  खून  मा जी,तिरंगा सुनौ।
           गिरा मार देवय,करम ला गुनौ।।

शक्ति छंद... बचावव पानी

चलव आज ठानौ,बचे नीर गा।
सबो दान करके ,हरव पीर गा।।
करम नेक करबे,बचे जान जी।
बचा नीर सुग्घर ,रहे शान जी।।

सुनौ नीर कतका,हमर काम के।
सबो मोल जानव,नही दाम के।।
धरौं ध्यान थोरे,बचत होय जी।
सुनौ नीर बिन झन,कभू रोय जी।।

शक्ति छंद....नारी नोहय पाप

सुनौ जान नारी,नही पाप गा।
   करौ मान ओखर,अपन आप गा।।
       जनम जान सुग्घर,सबो देत हे।
           मया देय कछु नइ,कभो लेत हे।।

करे देख दाई,करम नेक गा।
    धरौं पांव माथा,झुका टेक गा।।
        हरे देख पीरा,मया भाव ले।
           रहव दूर झन जी,मया छाव ले।।

हरिगीतिका छंद...करिया घटा

करिया घटा ला देख के,मन हा अबड़ मुस्काय गा।
गिरही जभे पानी सुनव,मन भीगते ललचाय गा।।
गिरही झिमिर पानी सुनौ,बदरा अबड़ सुन लाय हे।
संगी अगोरत जात हे,बदरा अबड़ तरसाय हे।।

पहली सुनौ पानी पड़े,माटी अबड़ ममहाय हे।
महकत हवय माटी सुनौ,मन चाटते हो जाय हे।।
पहली गिरे पानी लगय,मन झूमते इठलाय गा।
नाचत रहय मन बावरा,मुखड़ा सबो खिल जाय गा।।

हरिगीतिका छंद...फैसन बने हे फोन गा

फैसन बने हे फोन गा,दिनभर करे हे बात जी।
घूमत हवय बतियात हे,देखय नही दिन रात जी।।
चेटिंग करे दिनभर धरे,मेसेज सब कतका करे।
महिला धरे सब देखलौ,घर मा सुनौ सब्जी जरे।।

चुपचाप सब मुस्कात हे,हीं हीं सबो दिनभर करे।
सब चेट मा बतियात हे,पुस्तक घलो नइ ता धरे।।
फोकट समय बरबाद कर,लिखना पढ़े ला भूल गे।
जिनगी अपन समझे नही,सुन फोन के का मूल हे।।

हरिगीतिका छंद...साफ रखलव देश अपने

साफ रखलव देश अपने, करले जतन दे ध्यान गा।
महकत रहय चारो मुड़ा,अइसन बढ़ा तँय मान गा।।
कचरा डले सुन तीर मा,सबला लगा दव आग जी।
सुग्घर रही सेहत सुनौ,गावव सबो ऐ राग जी।

स्वस्थ रइही देह सबके,ध्यान रखबे ये बात ला।
रोज मिलही हवा मानौ,सुग्घर बना दिन रात ला ।।
सुन रेंग लव सुघ्घर डहर,सुग्घर रखव दे ज्ञान जी।

तोरे फरज अब्बड़ हवय,सुन गोठ ला रख मान जी।

हरिगीतिका छंद...सुग्घर हवय सुन देश जी

सुग्घर हवय सुन देश जी,हे मान गा ये शान गा।
जिनगी बसय सुन देश मा,बसथे इहे सम्मान गा।
अरपन करव सब देश बर,सेवा करव मिल देश के।
हिरदय बसे समता सुनव,सम्मान कर सब भेष के।।

बोली अलग मनखे अलग,ऐके रहय मिल साथ दे।
कतको रहय पीरा सुनौ,मनखे सबो सुन हाथ दे।।
सब मान लौ समता रखौ,मिलके करव सब काम ला।
सब राखलौ सब बांध लौ,नाता निभा कर नाम ला।।

गीतिका छंद...दीन मनके देख हालत

दीन मनके देख हालत,रोय दिन अउ रात गा
दुख दरद ला देख रहिथे,नइ गुनय सब बात गा।।
मान देखव रोज झेलय,देख लांघन सोय गा
का करय विपदा अबड़ हे,पेट पीरा होय गा।।

बोय खातिन खेत नइहे,दीन हर लाचार हे
जान नेता सोय हावय,देख नइ आधार हे।
देख आँसू थाम लव गा,दुख अबड़ हे जान ले
दीन मनके साथ देदव,शान ऐमा मान ले।।

जान चिरहा देह पहिरे,दिल अबड़ सुन रोय गा
नइ मिलय ता भात संगी,मान लाँघन सोय गा।
देख मिहनत राह धरथे,रोज पीरा झेल ले।
रोज रोजी मा कमाथे,पेट के सब खेल ले।।

सब मदत के राह धरवव,नेक रद्दा थाम ले
एक लइका ला पढ़ा दे,दिल डहर ले काम ले।
सुन बनय जी काज कखरो,नाम तोरे होय गा
भाग मनखे के बनादे,जाग काहे सोय गा।।

गीतिका छंद...दानी बनके देखले

दीन मनके देख हालत,रोय दिन अउ रात गा
दुख दरद ला देख रहिथे,नइ गुनय सब बात गा।।
मान देखव रोज झेलय,देख लांघन सोय गा
का करय विपदा अबड़ हे,पेट पीरा होय गा।।

बोय खातिन खेत नइहे,दीन हर लाचार हे
जान नेता सोय हावय,देख नइ आधार हे।
देख आँसू थाम लव गा,दुख अबड़ हे जान ले
दीन मनके साथ देदव,शान ऐमा मान ले।।

जान चिरहा देह पहिरे,दिल अबड़ सुन रोय गा
नइ मिलय ता भात संगी,मान लाँघन सोय गा।
देख मिहनत राह धरथे,रोज पीरा झेल ले।
रोज रोजी मा कमाथे,पेट के सब खेल ले।।

सब मदत के राह धरवव,नेक रद्दा थाम ले
एक लइका ला पढ़ा दे,दिल डहर ले काम ले।
सुन बनय जी काज कखरो,नाम तोरे होय गा
भाग मनखे के बनादे,जाग काहे सोय गा।।

गीतिका छंद...गुरु

मान हमला देत हावय,छंद के सब ज्ञान हा
ज्ञान सबला जान संगी,शान बढ़थे मान हा।
सीख जम्मो साज मनला ,देय गुरु सुन ज्ञान जी
काल हमरो होय जानव,जग हमर सम्मान जी।।

देख सुग्घर ज्ञान पाबे,होय जग मा नाम गा
ले चरण के धूल संगी,गुरु बनाये काम गा।
ध्यान धरले छंद मा जी,पाठ पढ़ले सीख ले
जान जम्मो मान बढ़ही,गुरु ले तयँ भीख ले।।

गीतिका छंद ....पानी बचत करौं

जान बचथे जीव चलथे,देय पानी मान ले
देख ऐखर मान कतका,मोल ऐखर जान ले।
कर बचत पानी जगत म,फेंक देवय झोंक के
सीख दे मनखे सबो ला,देख सबला रोक के।।

देख तड़पत जान मनखे,होय पीरा जान गा
जाय लेवन देख पानी,रोय सबझन मान गा।
रेंग जाथे का करे जी,दूर पड़थे गांव हा
घाम अब्बड़ हे जनाथे,नइ रहय जी छांव हा।

गीतिका छंद..माँ

माँ कहत हे जग हा जेला,लाय ए संसार मा
देय हमला नांव सुग्घर,सब चलय जी प्यार मा।
माँ दरद ला देख सहिके ,जान हे अवतार जी
मान सबला पोस लेथे,देख हिरदय प्यार जी।

पेट रहिथे देख खाली,रोज भोजन देय गा
माँ करत हे देख सेवा,सुन दरद सब लेय गा।
देय शिक्षा मान सुग्घर,माँ हवय आधार जी
दे जनम पालन करे गा,देय अबड़ दुलार जी।।

रूपमाला छंद....झूठ रद्दा छोड़

मान सुग्घर गोठ सबके,झूठ रद्दा छोड़
नेक भाखा राह चुनले,मान सबले जोड़
छोड़ ठेनी प्यार रखले ,नेक रद्दा जाव
प्रेम हिरदय भाव रखबे,होय मीठा भाव।।

नीक लागे राख आदत,गोठ अइसन बोल
भाव अइसे तोर रखबे,साज मीठा घोल
काल कब ले जाय संगी,कोन जाने राज
मान मनखे एक हावय,जान समता साज।

ताटक छंद....नोनी के पीरा

लुटत हवे मोर मान हा दाई,रोवत मयँ हावौ दाई।
जगा जगा मा छुपे लुटेरा,कोन डहर हम गोहराई।।

मयँ नारी अवतार जनम के,पाप करे मयँ हा भारी।
बेटी ला सब छलत हवय गा,कतका हे अतियाचारी।।

बिलखत तड़पत जिनगी होगे,कोन कहे अवतारी हे।
सुग्गर कइसे जीयौ जिनगी,नारी के दुख भारी हे।।

रद्दा रेंगव कोन डहर मयँ,कति गोहार लगावौ गा।
जीना चाहौ नारी जीवन,दुख ला मयँ हा पावौ गा।।

कलयुग के मानव ला देखे,नाबालिग ला नोचे हे।
देख राक्षस बन बइठे हे,मान कोन मन सोचे हे।।

कहाँ गवांगे माँ के ममता,बेटी मया भुलागे गा।
पापी बनगे आज देखलौ,नारी आज लजागे गा।।

मोला कोख मा मार गिराबे,दुनिया मा नइ आना हे।
तड़प तड़प के नइ जीना हे,मोला मान बचाना हे।।

ताटक छंद...भ्रूण हत्या रोकौ

भारत सुग्घर देश हवय जी,भ्रूण नाश हत्या रोकौ।
बेटी के सब मान रखौ जी,दोष बिना झन ता झोकौ।।

बेटी सुग्घर घर ला राखय,मान सबो के जाने जी।
घर के उजियारा सब कहिथे ,जम्मो नाता माने जी।।

भ्रूण नाश जी करत हवय सब,बेटा लालच जाने हे।
पोसत हावय आज देख ले,बेटी सबझन माने हे।।

जुग बदलिस अब सोच बदल गे,वंश एक अपनाथे गा।
बेटी दू ठन रखय शान ले,बेटी गुन बस गाथे गा।।

नेक सोच के रद्दा थामव,बेटी ला अपने जानौ।
पालन पोषण सुग्घर देदव,समता बेटा के मानौ।।

भ्रूण नाश ला मिलके रोकव,बेटी गुन समझावौ गा।
देख घटत हावय जनसंख्या,बेटी आज बचावौ गा।।

आशा के ताटक छंद ...महतारी के कोरा

सरग बरोबर लगथे सबला,महतारी के कोरा हा।
करे जतन दाई हा सबके,सुग्घर रहिथे तोरा हा।।

दाई जेला कहिथे सबझन,ओला दुख पहुँचाथे गा।
नौ महिना के पीरा सहिथे,बड़ ओला रोवाथे गा।।

जम्मो विपदा अपने जानय,दुख ला सबके लेथे जी।
अपने भूखा रहिके दाई ,अपने हिस्सा देथे जी।।

जनम देय नव जीवन तबले,दाई ला दुख देही गा।
आय सियनहा के बेरा तव,दुख ओखर नइ लेही गा।।

छोड़ जथे कोनो बेटा मन,काखर दुख गोहराये गा।
जतन सकल मा कतको राखय,बेटा गुन नइ गाये गा।।

सुनौ अगोरत रहिथे ओहा,बाढ़े मा नइ आये गा।
महल अटारी अब्बड़ भावय,कुरिया नइ ता सुहाये गा।।

ठाठ बाट मा नाता छोड़िस,वृद्धा आश्रम मा छोड़े।
रोवत रहिथे उहा अकेला,चल दे नाता ला तोड़े।।

कोनो बन जाथे कपूत गा,बोझ बरोबर माने हे।
आश्रम मा बिलखत हे दाई,दुख नइ कोनो जाने हे।।

सुग्घर देवय दाई जीवन,जनम मरन सबला जानौ।
इही जनम ला सुग्घर जीलौ,करम सही जम्मो मानौ।।

आशा के कुकुभ छंद....झन सहिबे नारी

काहे मारत पीटत हावस,मारे दहेज बर काहे।
लक्ष्मी हावय जम्मो नारी,सहिथे कोनो कछु चाहे।।

दाई बाबू छोड़ सबो ला,नावा घर मा सुन जाथे।
थामय जम्मो नाता ला सुन,फेर उही हा दुख पाथे।।

बने संगनी पति के सुनलव,पति ल परमेश्वर मानै।
पइसा कौड़ी लोभ मोह मा,फेर जानवर नर जानै ।।

कभू जलाइन बहू सुनव जी,लालच जेखर रहिथे जी।
बिन कारन के मारय पीटे,कतक दरद ला सहिथे जी।।

राक्षस बन जाथे मानुष मन,पाप अबड़ कर लेथे गा।
नारी के सम्मान भूल के,मउत उही ला देथे गा।।

जुग बदलिस बस लालच रहिगे,दे दहेज बस मांगे गा।
नइ देही परिवार सुनव ता, फसियाँ के ओला टांगे गा।।

अबड़ अतियाचार होवत हे,बेटी कइसे हे जीही।
अइसे पापी जगा जगा मा,घुट-घुट आसूँ हे पीही।।

अब नारी सुन जाग चुके हे,चुप नइ बइठे गा नारी।
भेज देहि गा जेल सबो ला,कोनो हो अतियाचारी।।

बांहें मा रख ताकत नारी,खुदे चंडिका बन जाबे।
पापी मानुष मार गिरा तयँ,तब तयँ सुग्घर जी पाबे।।

नारी के शक्ति मा बल हे,हिम्मत मा ताकत मानौ।
शिक्षा के सब नेक ज्ञान ला,जीवन मा पाना जानौ।।

सरसी छंद...सफाई

कूड़ा कचरा काहे राखौ,साफ रखव घर द्वार।
बीमारी झन हो कोनो ला,स्वस्थ रहे परिवार।।

कूड़ादान मा कचरा डालँव,रख झन रद्दा तीर।
नइ होवय हैजा मलेरिया,रहिथे स्वस्थ शरीर।।

गरवा कोठा दुरिहाँ राखौ,नहलाना नित जान।
सुग्घर जम्मो दवई छिड़कौ,पशु के देवव ध्यान।।

शौचालय ला दुरिहा राखौ,बीमारी नइ आय।
दवा छिड़क ले समय-समय मा,सबला ये समझाय।।

खेत खार मा शौच करव झन,बड़ बिमारी होय।
बीमारी हा घुस जाथे जी,दमा होय मा रोय।।

गंदा पानी झन पीयव जी,आंत करे नुकसान।
बीमारी हा कतक पेट के ,रहिथन हम अनजान।।

जूठा बरतन तुरते माँजौ,खाये जेमा भात।
सुग्घर तन-मन रोज राखके,स्वस्थ रहव दिन रात।।

आल्हा छंद... हमर देश के जवान

भारत हावय देश हमर जी,करें सुरक्षा बढ़थे मान।
सैनिक हावय मान हमर जी,इही बचावय सबके जान।।

फौजी बनके सेवा करथे,भारत भुइयाँ हवे महान।
दुश्मन ले लड़ जाथे ओमन,उही देश के सुनले शान।।

भारत के सीमा मा ठाड़े ,रात रात भर जागय जान।
नमन सबो झन इनला करलव,हावय देखौ सब बलवान।।

अपन खून ला बहा देय गा,लोहा लेथे अब्बड़ मान।
दिन देखय ना रात देखही,दे देथे जी अपने जान।।

भारत के झण्डा ला धरके,दुश्मन ला जी मार गिराय।
रखवाली सुन करय हमर गा,देख माथ सबके झुक जाय।।

अबड़ बलवान हावय सुनलव,हमर देश के सबो जवान
दुश्मन देखे थर-थर काँपे,ओखर करलौ सब गुनगान।।

मार गिरावाय हिम्मत ले वो,करें सामना बिन हथियार।
दुश्मन भागे देख फौज ला,सैनिक करथें सब उद्धार।।

आशा के आल्हा छंद...सुनले दुश्मन


सुनले दुश्मन मोर देश के,अबड़ मोर हिम्मत हे जान।
दुश्मन ला मँय मार गिराहूँ,अतका मोरे हावँय शान।।

मँय झाँसी के रानी आवँव,दुश्मन ला सब मार गिराँव।
बुरी नजर जे डाले सुनलव,नारी मनला न्याय दिलाँव।।

कहे मदर टेरेसा मोला ,दीन दुखी के लाज बचाँव।
दर-दर भटके जे मनखे मन,ओला अपने घर मा लाँव।।

कहे इंदिरा गाँधी मोला,नारी होके देश चलाँव।
अतियाचारी ला नइ छोड़ँव,नारी मनके लाज बचाँव।।

सैनिक बनके सेवा करथौं,दुश्मन ला जी देथौं मार।
डर के भागे दुश्मन सुनले,अइसन रहिथे मोरे वार।।

महिला मनके शान हवँव मँय,जानौ अपने सब अधिकार।
बाँह अबड़ मँय ताकत रखथौं,धरथौं हाथे मा तलवार।।

नारी ला सम्मान दिलावौं,इही हवे मोरो आधार।
नारी के मँय मान बचाथौं,जिनगी के बस एके सार।।

जुरुम करे जे प्रानी सुनले,ओखर करथौं गा संहार।
धर-धरके मँय मार गिराथौं, करौं देश के मँय उद्धार।।

कोर कपट के भेद जानथौं,दुश्मन बर ठाढ़े हे कान।
चलै नही जे रद्दा सत के,जीवन नइ देवँव मँय दान।।

तातंक छंद...शिक्षा के लाभ

शिक्षा के अनमोल रतन ले,करलव मन उजियारा जी।
हर विपदा मा पार लगाही,मिट जाही अँधियारा जी।।

जम्मो कारज बन जाथे जी,तुरते हल मिल जाथे जी।
जेखर मन मा ज्ञान दीप हे,जिनगी भर सुख पाथे जी।।

वैज्ञानिक बन जाथे कतको,खोज करें आनी बानी।
जब मशीन नावा खोजे ता,तब कहलाथे ओ ज्ञानी।।

शिक्षा के तकनीक देखले,नव विधि आज पढ़ाये गा।
प्रोजेक्टर मा चित्र देख ले,सबला देख बताये गा।।

कम्यूटर मा सबो आँकड़ा,राख सुरक्षा दे जानौ।
जनम मरन के कागद लेले,सुग्घर सुविधा ला मानौ।।

आनी बानी ज्ञान देख ले,इंटर-नेट कहाथे गा।
एक जगा मा बइठे संगी,जम्मो खबर बताथे गा।।

मोबाईल हे घरो घर मा,लेवय घर बइठे सेवा।
एखर तँय हा लाभ उठाले,राख ज्ञान के तँय मेवा।।

वैज्ञानिक अउ शिक्षक बनजा,सब बोलै तोला ज्ञानी।
बनके डाक्टर सेवा करले,दे जिनगी बनजा दानी।।

शिक्षा लेके ज्ञान बाँट दे,शिक्षा सुख पहुचाथे गा।
शिक्षक नव रद्दा देवय सुन ,नव आधार बनाथे गा।।

सुनले सुख हा ज्ञान मा बसे,मन मा दीप जलाले गा।
जिनगी मा तँय शिक्षित होके,जिनगी अपन बनाले गा।।

आल्हा छंद....झाँसी के रानी के महिमा

झाँसी के रानी के सुनलव,महिमा अड़बड़ हवय अपार।
झाँसी के रानी कहलाइस,दुश्मन के कर दिस संहार।।

सुनौ मराठा काल के रानी,उत्तर भारत के हे राज।
हिम्मत ला मरदानी कहिथे,गुन ओखर गावत हे आज।।

जनम लिये ओ वाराणसी म,बाबू मोरोपन्त कहाय।
सीख घुड़सवारी लक्ष्मी हा,पवन बरोबर वो उड़ जाय।।

गंगाधर ले बिहाव करके,बनगे रानी ओखर जान।
दामोदर ला जनम दिहिस जी,बनिस राज के ओहा शान।।

जुलुम करिन जब ब्रिटिश अबड़ गा,कतका हिम्मत ओखर मान।
एक-एक ला वो मार गिराइस,दुश्मन के वो लेवय जान।।

अपन पीठ मा बांधे लइका ,चढ़गे घोड़ा तान सवार।
मारिस सबला माछी मन कस,धरके हाथे मा तलवार।।

बचपन ले साहस ला राखिस,धरिस हाथ मा ओ तलवार।
आजादी बर साथ दिहिस गा,करिस जगत के ओ उद्धार।।

Saturday, 4 August 2018

आल्हा छंद...सच्चा ज्ञान

मानवता ला हिरदय रखलव,समता के सब पढ़लव पाठ।
भाईचारा  हिरदय  राखौ,बात  बाँँधलव  सबझन  गाठ।।

ठेनी झगरा छोड़ सबो ला,जुरमिल संगे बढ़ते जाव।
भारत के वासी आवन गा,जनगन वंदे सबझन गाव।।

दीन दुखी के सेवा करलव,मनखे मनखे ला पहिचान।
जेखर घर मा भोजन नइ हे,अन्न दान ले बढ़ही मान।।

नारी के रक्षा ला जानौ,सदा  दिलावौ  सब सम्मान।
रोवय झन नारी गा सुनले,सहय कभो झन ओ अपमान।।

मात-पिता ला सुग्घर पोसय,अइसन बाँटव सबझन ज्ञान।
वृद्धाश्रम मा झन  राखय गा,सदा  बढ़े सुन  घर मा मान।।

भेदभाव के बंधन तोड़ौ,भाई बहिनी सबला बोल।
गलत भाव झन मन मा राखौ,समता के रस मन मा घोल।।

गुरु के सुग्घर मान करौ गा,हवे ज्ञान के ओ भंडार।
आघू-आघू बढ़ जाहूँ सुन,सुग्घर बनही जी संसार।।

कोर कपट ला छोड़ चलौ गा,जलन भाव ला करदे त्याग।
मिहनत करके आघू बढ़जा,अब ता मनखे तँय हा जाग।।

सुग्घर हावय जिनगी तोरे,सत् के रद्दा सबझन जाव।
भारत मा सम्मान करय जी,सुग्घर अइसन मान बनाव।।

कुकुभ छंद...दारू झन पीबे

सुग्घर जिनगी जीले मानुष,दारू तँय हा झन पीबे।
सब संगी मन छोड़ जही ता,रोवत तँँय हा तब जीबे।।

चोरी के रद्दा धर लेबे,पइसा चोरी करबे जी।
धर लेही जब पुलिस हा तोला,जेल सजा मा मरबे जी।।

घर के विपदा नइ जानस तँय,पीयत खुदे भुलाये गा।
रोवत हावय घरवाली हा,ओला अबड़ सताये गा।।

बिन सोचें तँय मारत हावस,अब्बड़ नशा चढ़ाये गा।
भुगतत हे परिवार तोर सुन,भूखा रखे सताये गा।।

चिरहा लुगरा पहिनत हावय,तँय नइ जाने घरवाली।
भूखा रहिके बिलखत लइका,पेट रहय ओखर खाली।।

देख बिमारी मा तड़पत हे,तँय ता होश गवाये गा।
छोड़ जही तोला एक दिन सब,कोन बात समझाये गा।।

दारू गाँजा छोड़ सबो ला,सुग्घर जिनगी तँय जीले।
सबला दे तँय मया दया ला,गुरतुर भाखा रस पीले।।

सार छंद...नारी के सम्मान करौं

नारी हावय मान देश के,नमन सबो झन करलौ।
नारी मनके दिवस आज हे,चरन आज सब धरलौ।।

जीवन सबला देत हवय जी,जतन कोख ले करथे।
पीरा जम्मो ला सब सहिथे,नवा जीव ला धरथे।।

दाई बहिनी दीदी कहिथे,कहय जगत महतारी।
विपदा कतको रहय बड़े जी,दुख मिट जाथे भारी।।

झाँसी के रानी ला देखे,अब्बड़ साहस जागे।
धरे तलवार सबला मारिस,दुश्मन देखे भागे।।

दीन-दुखी के सेवा करके,अइसे माँ हे दानी।
हवे मदर टेरेसा सुन लव ,सुरता रहिथे बानी।

बनिस इदिरा गाँधी मंत्री,देश चलाइस अइसे।
नारी ला सम्मान दिलाइस,नेता महान जइसे।।

नारी के सम्मान अबड़ हे,अब्बड़ कथा कहानी।
भारत के गउरव हा बाढ़िस,होवत जगत बखानी।।

सबला जिनगी दान देय हे,बेटी दाई जानौ।
चरन पखारौ नारी मनके,देवी रुप ला मानौ।।

कुकुभ छंद...भ्रष्ट नेता

नेता अइसे भ्रष्ट हवय गा,अपन जेब ला भरथे जी।
वोट माँग के नेता बनगे,लोभ मोह बड़ रखथे जी।।

जीत जथे ता नेता मन सब,अपने सेवा ला जानै।
लूटत हावै गरीब मन ला,बात कभू गा नइ मानै।।

मरत हवे कतको किसान मन,दुख हावय ओखर भारी।
लागा  करजा  मा  सब  बुड़गे,अइसे  हावय  लाचारी।।

रोजगार सब खोजत हावय,पढ़ लिख के हावय खाली ।
घूस  दिये  अउ मिलय  नौकरी,ओखर  डिग्री हे जाली।।

टूटे घर  ला  फूटे  छानी,सबला कोन बनाही गा।
सरकारी पइसा खा जाथे,देखत रहँय तबाही गा।।

जे गरीब के खुलथे खाता,जम्मो पइसा ले जाथे।
मर-मर  के  जीये गरीब हा,नेता अपने गुन गाथे।।

नेता  मनके  हवे  सुवारथ,अब्बड़  पापी  बनगे  हे।
कोनो के कछु नइ बिगड़े जी,दुखियाँ सबो तड़पगे हे।।

खाता  सबके  खुलगे हावय,पइसा  एको  नइ  हावै।
काटत हावय बैंक देख जी,फोकट चारज कट जावै।।

लोन सबो के खा जाथे सब,दे सरकारी हमला जी।
नजर  गड़े हे  नेता मनके,होवत हे सब घपला जी।।

नेता  मनके  भ्रष्ट  काम  हा,बड़े  बिमारी बन गे हे।
राज-काज के लालच मा सुन,सबके माथा तन गे हे।।

कति के नौकरी मिलही गा बाबू

कति के नौकरी मिलही गा बाबू,
कति के नौकरी के आस लगाहूँ;
कतका पढ़ लिख डारे हो मँय हा,
कति के नौकरी ला मँय हा पाहूँ।
कति ले मिलही नौकरी गा बाबू...

किंदरत हावौ मँय डिग्री ला धरके,
घूँस बर पइसा कति  बर ले लाहूँ;
का सोच के पढ़े रहे मँय हा बाबू,
दुख सबो ला तुमनके मँय मिटाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

नइ हावै कोनो डहर नौकरी खोजे,
कति ले तुमन के करजा ला छुटाहूँ;
नइ हेे कोनो नेता के साथ गा बाबू,
साथे मा जेखर मँय हा पहुँच लगाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

काबर पढ़े मँय तँय हा काबर पढ़ाये,
गवाँये पइसा ला तोर कइसे छुटाहूँ;
जम्मो डहर पढ़े लिखे के रोना हावै,
कोनो डहर होय आसरा नौकरी पाहूँ।
कति के  नौकरी मिलही गा बाबू...

ठग ठग के जम्मो के पइसा ला खाथे,
अउ दे पइसा मयं सबो झन ला खवाहूँ;
गरीबहा घर के मयं लइका आवं साहब,
अतके पइसा   मय   कति बर ले लाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू...

दू रोटी के पुरति हावै जे घर मा पइसा,
ऐला गवाँके मँय बता गा काला खाहूँ;
झन संसो करबे बाबू पढ़ लिख के मँय,
का हो जाहि जेन मँय हल ला चलाहूँ।
कति के नौकरी मिलही गा बाबू....